बुँदेलखण्डी में दस स्वर और सत्ताइस व्यंजन हैं । हिन्दी के 16 अक्षर इसमें नहीं हैं। इसके 10 स्वरों में भी 8 स्वरों का उच्चारण बिल्कुल अलग है। इस मुख्य भेद को देखकर हमें चौंकना न चाहिये क्योंकि 2500 वर्ष पहले ब्राम्ही भाषा की वर्णमाला में 33 अक्षर हैं जिसमें स्वर केवल 6 ही हैं। 250 ई.पू. अशोक के धर्म लेखों से विदित होता हैकि अ,ई,ए,औ ैके लिए कोई अक्षर नहीं, ऋ, लृ तो हैं ही नहीं। एक हजार ई.पू. की अवस्था भाषा जो संस्कृति की बहिन है, उसमें 13 स्वर और 34 व्यंजन हैं जो सारे के सारे हलन्त हैं ही। 1000 ई.पू. की फिनौशियन भाषा में भी केवल 22 अक्षर हैं। इसके और पूर्व की इजिप्शयन भाषा के भाव चित्रों मेें सिफर् 24 व्यंजन ही है और स्वर दिखते ही नहीं । यूं तो मिश्र की इजिप्शन लिपि तीन खण्डों में चलती है। प्रथम काल पहिले राज्यवश से दसवे राज्यवंश 100-1700 ई.पू. तक भावचित्रों में 203 संकेत हैं । द्वितीय खण्ड में 14 राज्यवंश से 17वें राज्यवंश तक 1700-525 ई.पू. में जिसे ''हेरोटिक'' कहते हैं, कुल 24 व्यन्जनों की वर्णमाला थी। अन्त के काल को 'कोआप्टिक' भाषा 525 ई.प.ूर् से 638 ईस्वी तक तक आते हुए केवल 7 अक्षर और जुडे़ । याने 11 सौ वर्षो में 31 अक्षर वाली भाषा बनी और अंत में लुप्त हो गई। इसी तरह 3 हजार ई.पू. के करीब सुमेरी लिपि को अक्कादियों ने अपनी सिमैटिक भाषा के लिए अपना लिया। सुमेरी कीलाक्षर लिपि में 41 संकेत हैं। जिसमें 36 ध्वनि संकेतों से प्राप्त हैं। अक्कादियों के अक्षर से यह मेसोपोटमियां और सारे पश्चिम एशिया में फैल गई तथा इसी कीलाक्षर लिपि को अनातोली, कनानी, ह्रिवू और हितियों ने अपना लिया। फिर पूर्व की ओर की बाढ़ ने इसे एलाम और समस्त ईरान ने अपना लिया। भिन्न-भिन्न भौगोलिक स्थलों ने और देशों ने इस पर भी जरूर असर डाला, परिवर्तन भी किया इसीलिए इसके भावचित्र सिकुड़े और कम होते गए। चित्रात्मक से आरम्भ हुई यह लिपि भावात्मक, ध्वनिआत्मक तथा अक्षरात्मक स्वरूपों को लांघती हुई वर्णात्मक के स्वरूप में पहुंच गई। असीरी के अक्कदी में 600 संकेत थे। जिसमें भावचित्र भी भरे पड़े थे वे सुमेर और एलाम पहुँचेन पर केवल 120 चिन्हों में रह गई। आखिर 600 ई.पू. में ईरान के अखमानी साम्राज्य ने इन्हीं कीलाक्षरों अर्धवर्णात्मक में जन्म दिया। केवल 41 संकेत ही रह गए। यह सब परिव र्र्तन 3000 ई. पू. से 600 ई.पू. तक याने 2400 वर्षो में सम्पन्न हुआ। याने कीलाक्षर सुमेरी में कुल 41 संकेत है जो 36 ध्वनियों से प्राप्त होते हैं । जैसे चार संकेत राजा, प्रांत, भूमि और अहुर-मज्दा शुद्व भावचित्र हैं । सभी व्यन्जनों में अ स्वर निहित है और जिन व्यंजनों में इ, उ हैं उनके चिन्ह अलग हैं। इसी तरह सिन्धु-घाटी मोहन-जो-दारो और हरप्पा भाषा में श्री सुधाँषु शंकर राय द्वारा 48 वर्ण अक्षरों को ढूँढा गया है और डा. राव के अनुसार सिंध वर्णमाला में 15 व्यन्जन और सिफर् 5 स्वर ही हैं।
अगर हम आधुनिक प्रथम शताब्दी के वैद्याकर्णी वरूरूचि की महाप्राकृत पर नजर डालें तो उनकी परिपाटी के शिष्य आचार्य हेमेंन्द्र ने अपभ्रंंश में 9 स्वर और 26 व्यंजन बताए हैं। इसलिये यह स्पष्ट है कि बुँदेली न तो हिन्दी की बहन है और न तो संस्कृत की पुत्री। इसको स्वयं स्वतन्त्र भाषा होने का श्रेय प्राप्त है। हाँ हो सकता है संस्कृत से बुँदेली ने ठीक उसी प्रकार शब्द लिए हों जैसे कन्नड़, तुलुगू, मलयालम भाषाओं ने अपने 1 लाख शब्दों के अनुपात में 60 से 70 हजार शब्द उधार लिए हैं और तमिल ने तो लाख में सिफर् 40 हजार ही संस्कृत शब्द पचाए हैं।
क्या बुन्देली का कोई व्याकरण था
हिन्दी भाषा ने अपनी व्याकरण का सारा कलेवर संस्कृत से उधार लिया है और पचा भी लिया। इस प्रकार की बात बुँदेली में नहीं है। बुन्देली का प्रारम्भिक युग में कोई व्याकरण अवश्य रहा होगा। जो या तो अब लुप्त हो गया या छानबीन का मोहताज है। लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि यह कातन्त्र व्याकरण की परम्परा में पली है। साथ ही महेश्वर परम्परा याने पाणिनी व्याकरण से बहुत दूर तक अलग है। गम्भीरता से देखने पर महर्षि पाणिनी की व्याकरण शैली लगातार 2468 वर्षो से संस्कृत को अपने पन्जे में जकड़े हुये है,ं जकड़ें रखेगी। जब तक भविष्य युग की मांग के अनुसार टक्कर में दूसरा पाणिनी नहीं पैदा होता। आज तो भयंकर गति से बढ़ता हुआ आधुनकि ज्ञान हजारों नूतन शब्द तथा नई वाक्य रचना की मांग कर रहा है। नये संदर्भ में नये ज्ञान को नई व्याकरण परिपाटी भी चाहिये। कैसे.. ? कब.. ? यह तो भविष्य के गर्भ में है । पर आभास होने लगा है कि संस्कृत को पाणिनी के स्थान पर नये पाणिनी की आवश्यकता है। पाणिनी की जकड़ में फंसी संस्कृत अब छटपटाने लगी हैं। लेकिन बुँेदेली ने पहले से ही इस प्रकार की परिधि में घिरना अस्वीकार कर दिया और बोलचाल की परिपाटी वाली कातन्त्र व्याकरण को सहज अपनाया। इसलिए कि बोलचाल की भाषा सदा गिरती पड़ती सदा गतिमान रहती है तथा वह सदा-सदा आम जन समुदाय के निकट से निकट ही रहेगी, इसी कारण बुँदेली का दामन कातन्त्र की हवा में हिलोंरे लेता है।
कातन्त्र की परम्परा ऐन्द्र व्याकरण से प्रारम्भ होती है जिसे कुमार व्याकरण भी कहते हैं। युधिष्ठर मीमांसक ने '' व्याकरण शास्त्र का इतिहास'' में आदि व्याकर्णी इन्द्र को आठ हजार ई.पू. माना है। शायद यह तिथि अनिश्चित हो, कालगणना में अतिशयोक्ति हो, लेकिन इससे आदि पुरानापन तो विदित होता ही है। इन्द्र के बाद वायु, भारद्वाज, भागुरी, पोषकर, चारायण और काषकृत्सन हैं। अन्तिम तीन समकालीन हैं। काषकृत्सेन का व्याकरण तो 24 हजार श्लोकों में था। लक्ष्य रहे पाणिनी की व्याकरण से कहीं बड़ी ,दुर्भाग्य से यह अब अप्राप्त है, फिर भी इसके 141 सूत्र मिलते हैं । इसका सम्पूर्ण धातु पाठ कन्नड़ भाषा में मिला है। जिसे बाद में फिर से संस्कृत में उल्था किया गया है। सातवाहन काल के एक ब्राण शर्ववर्मा ने काषक्रत्सन का अत्यन्त प्रारम्भिक रूप सरली करण कर ''कातन्त्र'' के नाम से लिखा हैं। यही ''कातन्त्र'' बुन्देली भाषा की शिक्षा परिपाटी का स्रोत है। जिसकी उर्धवक्ता जड़ें वेदकालीन संस्कृत से कहीं आगे पूर्वकाल में बिखरी पड़ी हंै। प्रश्न फिर भी खड़ा है कि 'कातन्त्र' का विस्तार काल कितना है.. ? आचार्य इन्द्र, वायु, भारद्वाज आदिकाल से प्रथम, द्वितीय और तृतीय युग लपेटे हैं तथा अंत में चतुर्थ काल में पोषकर चारायण और काषकृत्सन है। आदिकालीन आचार्य इन्द्र की परिपाटी आठ सौवर्षोंं से कम प्रतीत नहीं होती हैं क्योंकि आदिकाल कभी भी लम्बा होता है। बुद्धि का विकास जैसे-जैसे बढ़ता है उसी तरह अन्य सुधार के काल कमोवेश छोटे होते चले जाते हैं। फिर आश्चर्य वायु और भारद्वाज द्वितीय तथा तृतीय युग लगभग 500 और 400 वर्णांे का निश्चित रहा होगा। तब कहीं आचार्य पोषकर, चारायण और काषकृत्सन ने एक ही युग के समकक्ष विराजमान हो अपनी परिपाटी को संजोगा- संवारा होगा। जिसका प्रारम्भ से अन्त तक का काल अवश्य से तीन सौ वर्षो तक चलता रहा होगा। अगर इसी काल को आचार्य पाणिनी के काल 480 ई.पू.र् जोड़ दिया जाय तो 2480 ई.पू. होता है। याने बुन्देली अपनी काषकृत्सन परिपाटी की पुरानी जड़ों में सूक्ष्म रूप से निश्चित विद्यमान चली आ रही है। फर्क इतना है कि उन बदलते गुणों में इसका क्या नाम था ..? पता नहीं। नामांकरण हुआ भी था या नहीं.. ? इसका कोई ज्ञान नहीं । शायद भविष्य की खोजों में कहीं मिले।
कातन्त्र के परिपक्व होने की उपरोक्त गणना कतिपय विद्वितजन कपलांे कल्पित भी कह सकते हैं। लेकिन पाणिनी की परिपाटी के विषय में स्वयं पाणिनी का वर्णन इस सन्दर्भ में हमारा मार्गदर्शक होगा। उन्होंने लिखा है कि उनके पहिले 65 व्याकरणरचार्य गुजरे हंै। अगर इन समस्त आचार्यो का काल 30 वर्ष प्रति व्यक्ति रखें तो काल 1950 वर्ष बैठता है ।इसी काल में पाणिनी का काल जोड़ दें तो 2430 ई.पू. होता है। साथ ही पाणिनी ने अपने पहले 10 आचार्यो की भिन्न-भिन्न परिपाटी का उल्लेख किया है। इनके नाम है- शकटायन, शाकल्य, आदिशाली, गाग्र्य, गालव, भारद्वाज, काश्यप, सेनक, स्फोटायन और चक्रवर्यण। एक परिपाटी का सुधार दूसरी में पहुँते तो पहुंचते काफी समय व्यतीत होता है । अगर औसतन प्रत्येक का समय 200 वर्ष रखें तो काल दो हजार वर्षो का होता है। और इसमें पाणिनी का समय 480 ई.पू. का समय निकलता है। उपरोक्त 55 व्याकर्णाचार्यो और दस भिन्न-भिन्न परिपाटियों का काल एक ही चक्र में समान्तर चलते हैं और एक दूसरे की बराबरी पर उतर आते हैं और तिथियां भी एक सी दर्शाते हैं।
बुन्देली का स्वर स्फुर्ण भेद
प्रथम हम स्वरों के उच्चारण को ही पकड़ते है। बुंदेली में दस स्वरों का उच्चरण हिन्दी के आठ स्वरों बिल्कुल भिन्न है। यह कैसे जाना जावे.. ? इसके लिए हमें ध्वनिशास्त्र पर नजर डालनी होगी। ध्वनि में केवल भेद ही नहीं वजन भी होता है। हमारे भाषा-शास्त्रियों ने इसे बड़ी बारीकी से नापा है। शब्द ध्वनि को 8 परमाणुओं की एक मात्रा कहा है। व्यन्जनों में एक मात्रा 8 परमाणुओं की होती है। डेढ़ मात्रा 12 परमाणुआंंे की। 2 मात्रा 16 परमाणुआंंे की ,ढाई मात्रा 20 परमाणुआंे की और 3 मात्रा 24 परमाणुओंं की होती है। इस क्रम में बुन्देली का स्वर उच्चारण वैभिन्न समझनें के लिये हम केवल 'अ' स्वर को लेते हैं। और इसके उच्चार्णो के पांचों अलगाव को मात्राओं में दर्शाते हैं।
स्वरनामाकरणमात्रापरमाणु संख्या
1.लघुउत्तर(अ-अनमर्ति)18
2.लघु(अ-क) हस्व112
3.गुरू(अ) दीर्घ2्!!16
4.गुरूतर(अ) अतदीर्घ2!!20
5.गुरूतम प्लुत324
इस तालिका को देखकर हम ठीक-ठीक समझ सकेंगे कि ध्वनि भेद कैसा होता है। हिन्दी के इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ और औ का उच्चरण 2!! से 3 मात्रा का होता है जबकि बुंदेली में इनकी ध्वनियां 1 से 2 मात्राओं, याने 8 से 16 परमाणुओं के माध्य से स्फुरिट होता है। इन्हीं मात्राओं की वहज से बुंदेली काव्य तथा संगीत में कितनी सरसता आती होगी इसका अन्दाजा लगाया नहीं जा सकता । अभी तक बुँदेली जगत ने ईश्वरी सरीखे कवियों को इस मापदण्ड पर तौला नहीं है और न उनकी स्वर ध्वनियों को संगीत लहरी में लेखबद्ध किया है।
बुँदेली में ई, ए, इ, ओ, औ, ऐ प्रत्यय हैं जब ये प्रत्यय बुँदेली धातु से जुड़ते हैं तो हिन्दी और बुँदेली का एक समान उच्चारण हो जाता है। जैसे बुँदेली चर धातु से चल शब्द और उसमें जब उपरोक्त प्रत्यय जुड़ते हैं तो इनका रूप चलो, चले, चली इत्यादि हिन्दी के समान ही होता है। लेकिन याद रहे इनकी बनावट में जमीन आसमान का फर्क है। क्योंकि फर्क 'अ' की पूर्व ध्वनि का है। बुँदेलखण्डी उच्चारण में 'अ' इस ध्वनि की कमी हो जाती है। सबसे विचित्र बात यह है कि बुँदेली में संस्कृत जैसी संधि अमान्य है। इसी अक्षर स्वर और व्यंजन एक दूसरे के सामने या बाद में स्वच्छन्दता से आते और व्यंजन एक दूसरे के सामने या बाद में स्वच्छन्दता से आते और बने रहते हैं। पास-पास रहने से उनके उच्चारण में कोई फर्क पड़ता ही नहीं।
बुँदेली में हिन्दी के अक्षर ऋ ल अं अ: ड, , ढ, ष, य, व, क्ष, त्र ज्ञ नहीं है। और स्वरों में अ आ को छोड़कर इ, ई उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ को संयुक्त अक्षर माना है। इसलिये इनके उच्चारण में बड़ा फर्क पड़ गया है। उदाहरण लीजिये-
'ई' स्वतन्त्र स्वर ने होकर अ+ईअी है इसी तरह 'उ' पूणाँस्वर नहीं बल्कि अ+उअु अथवा अ+ऐअै, अ+ओअऔ इत्यादि । इसी संदर्भ में उपरोक्त 'इ' की लिपि का कुछ इतिहास भी देखें। दक्षिण भारत के मदुरा तथा तिरूनेलवेली जिले के सित्तनवासल स्थान के गुफा लेखों से क.े व्ही. सुब्रामण्यम अययर ने यह सिद्ध किया कि इनमें 'इ' अक्षर के लिए एक दण्ड और दोनों ओर दो बिन्दुओं का चिन्ह मिलता है। इस 'इ' के लिए उत्तर भारत में इस प्रकार का चिन्ह 300 ई.पू. तक के ब्राी लेखकोंं में कहीं भी प्राप्त नहीं होता। लेकिन कालांतर में यही चिन्ह उत्तर और पश्चिम भारत के लेखों में मिलता है। इसलिए यह सहज कहा जा सकता है कि ई.प.ू तीसरी शताब्दी में' ई' का यह चिन्ह दक्षिण से उत्तर पहुँच गया था। और इसका स्वरूप 'इ' बना। इससे भी अनुमान किया जाता है कि उत्तर भारत में' ई' का स्वरूप बहुत बाद में जुड़ा। चूँकि बुन्देली इस युग से बहुत पहले प्रचलित थी तो इस 'इ' की ध्वनि जैसे वैदिक काल के पूर्व थी उसी तरह इसका उच्चारण कायम रखा और अ+ईिअ की तरह युक्ताक्षर माना तथा स्वतन्त्र स्वर मानने से इंकार कर दिया।
यहां पर थोड़ी चर्चा वैज्ञानिक ढंग से, बुन्देली किस काल में बनती रही यह भी मालूम करना जरूरी है। अस्तु आधुनिक विद्वानों ने वैदिक भाषा के काल को पांच सौ ई.पू.मध्यकाल 500-1000 सन् तथा वर्तमान काल 1000 सन् से आज तक माना है। यह गणना ढेर से पाश्चात्य पण्डितों से वेदों की रचनाकाल निर्धारित करने की वजह से है। लेकिन जब ऐतिहासिक दृष्टि से व ासुदेशरण अग्रवाल ने पाणिनी का काल 484 ई.पू. कूता है तो वेदों का काल 1500 ई.पू. मानना आश्चर्य होगा। वेदों की काल रचना 25 सौ से 15 सौ ई.पू. होना निर्धारित हो चुकी तो 'छन्दस पाली' प्राकृत तथा अन्य बोलियों की उमर का अंदाजा लगाना आसान है। पाली प्रकृत की प्रथम अवस्था का नाम है। सम्भव इसी कारण भारत मुनि ने प्राकृत भाषाओं का उल्लेख मागधी, अवन्सी, प्राच्य, शैरसेनी, अर्ध मागधी, बाल्हकि और दक्षिणात्य मेंकिया। बाद में आचार्य हेमेंन्द ने पैशाची और लाटी अधिक जोड़ दी,। लेकिन देखा जाये तो मागधी, अर्धमागधी, शैरसेनी और महाराष्ट्रीय के ये चार प्राकृतें ही मुख्य हैं। पाली भी पंक्ति पाठ का अपभ्रस शब्द है। पाली के पूर्व वैदिक भाषा को 'छन्दस' कहते थे। 'छन्दस' ने ही प्राकृतों को जन्म दिया अथवा दोनों समकक्ष चलती रही। फिर भी छन्दस को पाली तक पहुँचने में 15सौ वर्ष लगे होंगे। तब प्राकृत रूप उभरता है। यह युग 500 ई.पू. से एक हाजर सन मानते हैं। लेकिन पाली का सादि स्वरूप पाली में निहित है।
उसी तरह पाली छन्दस् से गुत्थी हुई है। अर्थात प्राकृत की परिपाटी भी छन्दस् के गर्भर् में निहित है। मुख्यत: पाली बुद्ध के वचनों में है और बुद्ध का काल 624 -544 ई.पू. माना जाता है। पर पाली शब्द का प्रयोग ईस्वीसन की 5वीं शताब्दी में आचार्य बुद्ध घोष ने सर्वप्रथम उपयोग किया है और ई.पू. पाली शब्द का कहीं प्रयोग नहीं मिलता तो क्या 624 ई.पू. 500 सन् यानेे 11सौ वर्षो तक पाली थी ही नहीं.. ? या बनती रही ..? अगर इतना लम्बा काल नामकरण के लिये लगता है तो उद्गम कहाँ रखना चाहिये.. ? इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। आचार्य हरिहर निवास द्विवेदी ने तो बौद्ववाँगमय की पाली तथा शैरसेनी को वेत्रवती की पुत्री कहा है। याने उसके भौगोलिक क्षेत्र को भी निर्धारित कर दिया है। इसलिए प्राकृतों से निकलनेवाली या उसके समकक्ष सब बोलियों का उद्गम 'छन्दस' से है। याने बुँदेली का प्रारंभिक काल 15सौ ई.पू. मानने में कोई बाधा प्रतीत नहीं होती ।
पूर्व में हमने बुँदेली और हिन्दी उच्चारण भेद को समझा अब हम इनके अक्षर में दोनों को भी देखें संस्कृत या हिन्दी का आदि स्वर ऋ' बुँदेली में अ, इ, उ से सीमित रहता है। प्राकृत में भी 'ऋ' ध्वनि अ,इ,उ स्वरों से किसी एक में बदल जाती है।
संस्कृत ...............पाली.....................प्राकृत..................बुँदेली....................
ऋक्षअच्छअच्छसध (ई)
हृदयहदयहदयहिरदै (र)
मृगमगमगमिरगा (ई)
पुष्करपोक्खरपोक्खरपुखरा (उ)
मृत मिटमिटमाटी(अ)
अब हिन्दी के अ, आ, इ, ई, उ, ऊ ए, ऐ, ओ, औ स्वरों का उच्चारण बुँदेली में इस प्रकार होगा अ, आ, िअ, अी, अु, अू, अे, अै, औ हिन्दी के अं आ: तो संयुक्त अक्षर होने के नाते बुँदेली में शामिल नहींहैं। साथ ही हिन्दी का एअ+ई औअ+ऊ तथा ए की वृद्धि ऎ और ओ की बुद्धि औ है इसलिए प्रारम्भिक रूप से बुँदेली में अ आ दो ही मूल स्वर हैं। इ उ तो दोनों हलन्त हैंं। अत: हम कह सकते हैं कि अ, इ, उ ही बुँदेली के स्वर मात्र हैं। प्रथम 'अ' पूर्णस्वर तथा अंत के इ उ हलन्त हैं।
'धातु.......
किसी भी भाषा का मूलाधार धातुंए हैं। आज के पाश्चात्य विद्वान धातुओं को अमान्य करने लगे हैं। कारण कुछ भी हो पर लगता है कि उनकी भाषाऐं इतनी मिश्रित हैं कि मूल का पता पाना असम्भव है। लेकिन अगर हम अपने धातु जगत को भूल जावें तो समस्त भाषाओं का कलेवर ही ढह जावेगा।
हम प्रथम संस्कृत को लेते है। पाणिनि के अष्टाध्याई में 1944 संस्कृत की धातुयें गिनाई हैं। भट्टो जी दीक्षित ने उनके ग्रंथ पर टीका टिप्पणी करते हुए 2148 धातुंए लिखी हैं जिनमें दो सौ धातुऐं वैदिक काल में ही लुप्त हो गईं। इसलिए उनके अर्थ और उपयोग नष्ट हो गए । और इसी तरह दो सौ अन्य धातुओं का उपयोग ही समाप्त हो गया। अगर लेखा-जोखा किया जाय तो तो कुल धातुऐं 1748 रह जाती है। आम भ्राँति संस्कृत के बारे में यह भी है कि अन्य भारतीय भाषाएं इन्ही धातुओं पर अपना कलेवर बांधे हुए हैं। बात ऐसी नहीं, आचायों ने महाराष्ट्रीय प्राकृत की 639 धातुयें हैं और अपभं्रश की 850 धातुंए हैं । दोनों मिलाकर 1489 हैं और इनका संस्कृत से बिल्कुल अलगाव है। बुन्देली की भी अपनी धातुएं हैं जो इन्ही से ही ली गई हैं। जहां तक हिन्दी का प्रश्न है डा.रघुवीर ने अपनेहिन्दी शब्द कोष में संस्कृत से हिन्दी के लिए सरल 520 धातुंए लेना समुचित समझा और कहा कि बीस उप-सर्ग और 80 प्रत्यय जोड़ने से लाखों शब्द बनाये जा सकते हैं। लेकिन इतने शब्द अभी पैदा नहीं हुए हैं। बुन्देली की व्याकरण के लेखक श्री नुना जी ने अपनी पुस्तक ''बुन्देली भाषा का बुनियादी शब्द भंडर मे''ं लगभग बुनियादी ्रिकया शब्द 750 की बात कहीं है। बुँदेली में प्रत्येक मूल शब्द को लिंग, वचन, पुरूष, वाच्य और काल भेद से करीब 288 शब्द होते हैं तो सिफर् 750 के 2 लाख 16 हजार शब्द अनायास बने हुए हंै।
लक्ष्य रहे कि संस्कृत उपसर्गो का बुँदेली में कोई उपयोग नहीं क्योंकि बुँदेलखंडी इसमें बिल्कुल भिन्न हंै। जब यह संस्कृत की जोड़ में उतनी दूर है तो हिन्दी की बात ही क्या! क्रियाओं के विभिन्न काल दर्शाने वाले प्रत्यय स्वंय भिन्न हैं। कोई एक दूसरे से मिलता नहीं । धातुओं में विकार भी अलग प्रकार से होता है। वैसे तो क्रियाओं में जुड़ने वाले सब प्रत्ययों का हिंदी में अभाव है। हिन्दी तो सीधे संस्कृत से प्रत्यय उधार लेती है। जिसके बुँदेलखण्डी से कोई मेलजोल बैठता ही नहीं। बुँदेली में संज्ञा शब्द कितने ही देहाती से प्रतीत क्यों न हो, पर वे स्वयं में सहज हैं और हिन्दी से उनकी विशेष भिन्नता दिखती है। यही भिन्नता भाव-वाचक, व्यक्तिवाचक, जातिवाचक नामों में भी प्रतीत होती है।व्याकरण का मूलाधार अक्षरों के उच्चारण में निहित हैजो अपने-अपने स्थान से भेद भी दर्शाता है।वैदिक ध्वनि समूह में 52 ध्वनियां हैं। स्वर 13 जिनमें मूल 9 और 4 संयुक्त ,फिर 39 स्पर्श व्यंजन हैं।
मानव को ज्ञान कोष की वृद्धि के साथ ध्वनियां भी बढ़ानी पडी़ ताकि शब्द कोष बढ़े । इसलिये संस्कृत के फैलाव में ध्वनियों का विस्तार कना पड़ा लेकिन मूल ध्वनियां कहीं न कहीं तो थी हीं और वे संस्कृत के लिये छन्दस् से प्राप्त हुई और इसी छन्दस् सेपंाली ने भी ली परन्तुवह उनका विस्तार नहीं कर पाई। फिर भी वह अपना ज्ञान 10+3344 ध्वनियों से निकाल लेती थीं। क्योंकि इसमें सहज लोच था। इसी प्रकार बुन्देली तो 10+2737 से ही अपना कार्य चला लेती थी। क्योंकि इसमें समयानुकूल शब्दावली प्राप्त थी। याने इन्हीं 37 और 44 स्वर व्यन्जनों का विकास 52 ध्वनियां हैं इससे प्रमाणित होता है कि 37 ध्वनियों वाली बुँदेली बोली या भाषा सबसे पुरानी हैं और वह अपना अस्तित्व अभी तक शान से निभाये चली जा रही है चाहे इसकी माता 'प्राकृत' दादी 'पाली' और परदादी 'छन्दस' क्यों न रहीं हो।
यहाँ यह भी कह देना जरूरी है कि प्रत्येक संस्कृत अक्षर की ध्वनियाँ 2835 प्रकार की हैं और इस महती छलनी से छानकर बुँदेली की ध्वनि प्रकार भी निकालना होगा। यह शोध कार्य विद्वानों का अभी मोहताज हैं।
कैसी अजीब बात है कि इस महती गुण भरी पुष्ट बुन्देली को हिन्दी दां लोग प्रिमेटिव (गंवारू) बोली समझते हैं सच तो यह है कि यही देहाती बोली संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी के जोर जुल्म को बरदाश्त करने के बाद भी 2500 वर्षो से जीवित है और लहराती चली जा रही है।