जब हिन्दी लिखी नहीं जाती थी और वह खड़ी बोली कहलाती थी, तब भी बुन्देली राजभाषा के पद पर अभिषिक्त थी। यह सिलसिला एक शताब्दी से अधिक चला। बुन्देली में शासकीय पत्र व्यवहार, सदेंश, बीजक, राजपत्र, मैत्री- संधियों के अभिलेख प्रचुर मात्रा में मिलते है। औरंगजेब भी हिन्दू राजाओं से बुन्देली में ही पत्र व्यवहार करता था। शिवाजी भी महाराष्ट्र के बाहर बुन्देली में ही पत्र व्यवहार करते थे।
साहित्कारों का सम्मान
छत्रसाल जब यमुना से नर्मदा एवं चम्बल से टौंस के बीच के बुन्देलखंड राज्य के स्वतंत्र शासक थे तब उन्होंनें अस्सी बुन्देली कवियों को सम्मानित कर उन्हें जागीरें देकर अपनी राजधानी के आसपास बसाया था। अब उनकी लिखी सैकड़ों अनमोल रचनायें पुस्तकें अप्रकाशित पांडुलिपियां नष्ट हो रही है।
साहित्यकारों को जो सम्मान महाराजा छत्रसाल ने किया वह विश्व इतिहास में एक मिसाल है। जब किसी राजा ने साहित्यकार की पालकी को कंधा दिया तो ,उसका नमूना है कि महाकवि भूषण जब शिवाजी के दरबार से जब पन्ना आये तो फिर वापस ही नही गये।
समृद्ध परम्पराएं
लालकवि और भूषण की वीर रस की रचनायें जिसके उत्साह से भरपूर बढ़ी हुई बुन्देला फौज के आगे मुगल सत्ता थर्राती थी। और आल्हा के वे गीत जो बुन्देलखंड की चौपालों पर ढ़ोलक की थाप पर सारी बरसात गुंजते हैं।
संत परम्परा में सूर , तुसली, पदमाकर, केशव दास अक्षर अनन्य और प्राणनाथ के दर्शन की परम्परांये रही हैं, वहीं पर ईसुरी ने बुन्देली में श्रंगार के रंग को खूब निखारा है । ईसुरी की फांगे आज भी जवान दिलों को गुदगुदा जाती हंै। राई का लोकनृत्य संगीत और सदा जवान गीत जिसने सुना उसका दीवाना हो गया, सहजता से गुनगुनाने लगते है। कंठ उसे उसकी स्वर लहरियां सारी- सारी रात ढ़ोलक की थाप पर वातावरण में मदहोशी बिखेर देती है।
लोक न्ृत्य
सारा बुन्देलखण्ड उत्सवधर्मी है। जन्म से मृत्यु तक सारे संस्कारों के अवसरों पर, तथा बधाई बन्ने, सोहर, देवी गीत और शादी व्याह के अवसर पर हर क्षण वे गाते हैं।इन गुमनाम गायकों गीतकारों की रचनाएं जिसका नाम अबतक कोई नही जानता। राई ,बरेदी नृत्य, सैरा, धोबी नृत्य जैसी अनेक विधाएं है जो परम्परा से इस माटी में थिरकती हैं।
शब्दों की शक्ति
ठेठ बुन्देली का ठाट ही अलग है।उसका शब्द कोष हिन्दी से अलग है ,वह संस्कृत का मोहताज नहीं हैं। ं एक- एक क्षण के लिए अलग अलग शब्द हैं। गींतो में प्रकृति के वर्णन के लिए, अकेली संध्या के लिए बुन्देली में इक्कीस शब्द हैं।हर क्षण के लिए अलग, भला विश्व की किसी अन्य भाषा में ऐसा.. है?
बुन्देली में वैविध्य है, बंादा का अक्खड़ पन और नरसिंहपुर की मधुरता दोनों ही बुन्देली में है। सतपुड़ा के अंचल में ,उसमे वनवासी निश्छलता की लय है।
बुन्देली कितनी पुरानी ?
बुंदेली खंड और बुन्देली कितने पुराने हंै कोई नही जानता ।ठेठ बुंदलेी के शब्द अनूठे हैं जो सादियों से आज तक प्रयोग में हैं। केवल संस्कृत या हिन्दी पढ़ने वालों को उनके अर्थ समझना कठिन हैं । ऐसे सैकड़ों शब्द जो बुन्देली के निजी है,जिनके अर्थ केवल हिन्दी जानने वाले नही बतला सकते, बंगला या मैथिली बोलने वाले आसानी से बतला सकते हैं।
बुन्देली और बंगला
बुन्देली बोलने का लहजा या शब्द विन्यास जैसे बंगला में वाक्य के अंत में क्रिया- आता हॅू ,जाता हूं ,जैसे शब्द आने की मजबूरी नही है। बल्कि 'काय बड़े दा कहां जात'... बंगला के विन्यास से मिलता-जुलता है। विस्तार में न जाकर दोनों के एक समान धरातल पर आने वाली ऐतिहासिक घटना पर ध्यान जाता है जब भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश लोकभाषा पाली में दिये थे। कदाचित यह उसी मैथिली एंव बुंदेली का समन्वित रूप रहा होगा जो विध्ंयाचल पार कर चीन, जापान तक फैल गया होगा। यह शोध का विषय है।
बुंदेली संस्कृत की दादी मां
इतिहासकार कहते हैंे कि पाली और प्राकृतिक के सम उपयोग से संस्कृत की नागरी भाषा की सृष्टि हुई। इस तरह वकौल उनके पाली की जननी होने के नाते लोक भाषा बुन्देली की संस्कृत की दादी मां का स्थान मिलना चाहिए।
महाराज छत्रसाल ने बाजी राव पेशवा को तीसरा बेटा मानकर भावना वश राज्य का हिस्सा बाजीराव को उपहार में दे डाला । उसके बाद मराठों ने भी उस भाग में बुंदेली को राज्य भाषा पद से हटाने में कोई कोर कसर नहीं रखी।
डा महेन्द्र श्रीवास्तव |
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