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बुन्देली संस्कृति का विकास
भूगर्भ शास्त्रियां ने कहा है कि  जब हिमालय भी नही था , तब भी विंयाचल था , मीठे पानी की नदी नर्मदा सर्वप्रथम अस्तित्व में आई थी । पद्मपुराण ने लिखा है कि ऋषभदेव जम्बूद्वीप के राजा थे और उनके बड़े पुत्र भरत के नाम से इस देश का नाम भारतवर्ष हुआ । सतयुग में लोग शैलाश्रयों में रहते थे । पुरातत्व शास्त्रियों के अनुसार यह शैल नगर जम्बूद्वीप पचम़ढ़ी में है।

इन तथ्यों के आधार पर लगता है कि मानव सभ्यता के विकास के समय नन्दनवन या ईडन गार्डन यहीं कहीं पचमढ़ी और नर्मदा के बीच ही रहा होगा 

पुराणों में तो यह भी लिखा है कि जब दैत्यराज हिरण्यकश्यप को मारकर भगवान नृसिंह ने जब प्रहलाद को बचाया तब भगवान नृसिंह के आनंदाश्रु से दशार्ण नदी की उत्पत्ति हुई । यह आज की वही धसान नदी है जो रायसेन (सिलवानी ) सियरमऊ नामक ग्राम से निकलती है और केसली गौरझामर होकर सागर जिले में प्रवेश करती है। प्रहलाद, ध्रुव  और दत्तत्रैय की यह तपोभूमि जांे कालांतर में यहां जनपद का लमें दर्शाण जनपद कहलाई , जिसकी राजधानी विदिशा में थी । यही बौद्धकाल में 'जेजाकभुक्ति ' या जुझार खंड जो यजुर्वेद की भूमि है ,बाद में बुंदेल खंड कहलाईै ।

वैभवशाली अतीत
वैदिक काल का आर्यावर्त ,पौराणिक काल की मध्य देश ,रामायण काल का दक्षिण कोसल , गुप्तकाल को जेजाकभुक्ति और राजपूत काल का बुन्देलखंड नाम से जाना जाने वाला यह प्रदेश जिसने सारी दूनिया को मानवता का संदेश दिया ,आज विपन्नता के बीच कराह रहा है। इस माटी का कुसूर कया है.. ? बस, यही कि हमने विदेशी आततायियों का जीना हराम कर दिया । कि उन्हा,ेंनेे औरंगजेब , शाहजहॉ जैसे बादशाहंों ेको नाकों चलने चबबा दिए । यहां की नारियां ंस्वतन्त्रता संग्राम में लड़ीं , यह सब मुगलों को नही भाया , अंग्रेजांे को नही भाया । उन्होंने बुन्देलखंड की सांस्कृतिक धरती को पांच भागों में बांट दिया ताकि बुंदेलखंड की तीन करोड़ जनता कभी इकट्ठी न हो सके तथा दिल्ली दरबार का सरदर्द न  बने ।

मुगलों ,अग्रंेजों ने इसे छला तथा बुन्देलखंड और महाराष्ट्र को पांच अलग - अलग राजनीतिक टुकड़ों में बाट दिया गया । महाराष्ट तो 1957 में किसी तरह एक हो गया किन्तु बुदेलखंड आज भी खण्ड -खण्ड है।

देश की रक्षा के लिए चम्पतराय, वीर छत्रसाल, झॉसी की रानी ,गढ़ामंढ़ले की दुर्गावती ,राजा शंकर शाह और मंगल पांडे के बलिदानों का यह नतीजा है कि इस भूमि को जो सजा अंग्रेजों  ने दी उसे कायम रखा जाए । और बुन्देलखण्ड को एक नही होने दिया ।कैसी विडम्बना है कि हम हए ओर तो देश के एक होने की बात करते हैं दूसरी ओर बुन्देलखंड को टुकडों में बाटने की वकालत करते है ..?

तपो भूमि
बुन्देलखंड भूमि ऋषियों की तपोभूमि रही है। अमरकंटक के कपिल, ग्वालियर के गालव, ,पन्ना में वज्र की हड्डी वाले दधीचि, चित्रकूट में अत्रेय गौतम ,अत्रि आश्रम भगवान दत्तात्रेय की जन्म भूमि है। महिस्मती (मण्डला ) में मण्डन मिश्र, जबलपूर में जाबालि, भगू वाल्मीकि, विश्वामित्र के आश्रम भी इसी धरती पर कहीं थे।

इस प्रकार सतयुग से लेकर महाभारत काल तक की घटनाओं का साक्षी है बुन्देलखंल । यही कारण है कि मानव सभ्यता के प्राचीनतम चिन्ह आज भी बुंदेल भूमि में दबे पड़े हैं।

सभ्यता के अवश्ेाष
विंध्य की तपोभूमि ,नर्मदा की सिद्विभूमि ,सतपुड़ा की सभ्यता के अवशेष ,टीलों में दबे मंदिर ,शहर और सभ्यतायें चीख चीखकर कह रहे हैं ंकि आर्य कहीं बाहर से नही आये बल्कि दूनिया की सारी सभ्यतां नर्मदा घाटी से ही बाहर गईं ।

जाने कितनी बर्बर जातियंा बाहर से आयी और यहीं संस्कृति के मलबेे पर बस गयीं । संुस्कृतियों के मलबे पर बसे हुए असंस्कृत लोग उस धरती के मूल निवासी कैसे हो सकते है।.. ?

पुरातत्व शास्त्री कहते हंै कि भीली भाषा में साठ प्रतिशत से अधिक रूसी भाषा के शब्द हैं और अब रूसी भी कहने लगे हैं कि वे नीली आंखो वाले भील उनके पूर्वज है । ऐसी कितनी ही बर्बर जातियों के पूर्वज सभ्यता के मलबे असभ्यता की जिन्दगी जी रहे हैं ।सभ्यता के मलबे  पर बसा हुआ बुन्देलखंड कब अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त करेगा। जहंा पुरात्त्व का जखीरा दबा पड़ा है । जहंा वेद पुराण, रामायण, महाभारत के प्रमाण दबे पड़े हैं ..?

समृद्ध संस्कृति
बुन्देली संस्कृति कुछ निराली है। दिल दिमाग के धनी केशव , तुलसी ,पद्माकर, तानसेन लाल कवि ईसुरी ,घाव , भड्डरी और ऐसे ही जाने कितने 'लाल' बुन्देल भूमि ने दिए ।
बुन्देली गीतों में आल्हा ,रामायण, ईसुरी की फागें और लोकगीतों , लोकनृत्यों ,उत्सवों की प्राचीन परम्परायें हैं। बुन्देली साहित्य ,बुन्देली संस्कृति पुरातत्व  और परम्परायें जिन्हें औरंगजेब जैसा बर्बर आततायी आक्रमण भी नष्ट नही कर पाया , उसके समय भी बुन्देलखण्ड के मन्दिर नही टुटे , जजिया कर नही लगा । पर अफसोस है कि आज बुंदेली के प्रति बंदर बाट की नीति चल रही है। बुन्देली अकादमी को दुध की मक्खी की तरह निकाल फेंका गया है। दूसरे प्रदेशों से आकर दक्खिनी गवयेै लाखों रूपयों के पुरस्कार हमारे खजाने से हर साल ले जाते हैं, पर बुन्देली साहित्य का विकास तो क्या उसके उपलब्ध साहित्य की धरोहर की रक्षा के लिए पूर्व शासनकालों में कुछ नही किया गया ।

बुन्देली तिल -तिल कर नष्ट हो रही है । बुंदेली के 400 कवियों की रचनाओंे की सांस्कृतिक धरोहर को हर साल दीमक चाटती जा रही है। हिंदी जब मात्र खड़ी बोली थी, तब भी बुन्देली भारत की राजभाषा रही है , संपर्क भाषा रही है।

आंैरगजेब हिंदू राजाओं को बुन्देली में पत्र लिखता था ।शिवाजी महाराष्ट्र के बाहर बुन्देली में पत्र लिखते थे। दो सौ साल तक राष्ट्र भाषा और संपर्क भाषा रहने के बाद राजभाषा बुन्देल नष्ट कर दी गई । औरों की कौन कहे अपनी वचनबद्धता  के अनुसार महाराज छत्रसाल ने जिस वाजीराव को अपना तीसरा बेटा मानकर बंटवारे में उसे अपने राज्य का तीसरा भाग, भावनावश उपहार के रूप में दे डाला ,उन मराठों ने भी बुन्देली को राजभांषा के पद से हटाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी ।

स्वतन्त्रता के बाद जब मेरठ की खड़ी बोलाी असमी, उडि़या कोकणी , पंजाबी, कश्मीरी, डोगरी, देखते - देखते बोलियों से भाषा बन गई , वही 3 करोड़ बुन्देली भाषियों की भाषा विध्यवाा हो गई । अं्रगंेज करते यह हत्या तो कोई अफसोस न होता । पर हमारे अपने नेताओ के रहते राजभाषा बुन्देली को नष्ट होता देख कर एक टीस तो उठती है।

बुंदेलो का विस्तार
बालाघाट का कवि जब ग्वालियर में बुंदेली गीत गाता है तो दोनो के स्वर समान होते है। महसूस तो होता है कि दोनो की भाषा एक है , स्वर एक है। लोकोक्ति है

भैंस बंधी है औरछे, पड़ा होशंगाबाद ।
लगवैया है सागरे, चपिया रेवा पार ।।

यह बुन्देली ही तो है जो बांदा से बालाघाट और गुना से मण्डला तक बोली जाती है। राजनीति हमें लाख बॅाटती रहे, हमारे भाषा -संस्कृति और जीवन दर्शन तो एक हैं। तब हमें क्यों एक होने देने में लाख अडचने आती है ..? हमें एक होने से क्यों रोका जात है ..? सागर , झॅासी सम्भाग और भोपाल में बुंदेली संस्कृति का विस्तार है। 28 जिलो में पसरी बुन्देली परम्पराओं की रक्षा के लिए बुन्देलखंड परिषद को पुनस्र्थापना के समय हमारे सामने एक बडी चुनोती आ गई है। ढाई करोड़ से अधिक लोगों की आकांक्षाओं की उपेक्षा करना अब सम्भव नही रहा है। बुन्देली संस्कृति राजभाषा बुन्देली और लोक परम्पराओं को एक सूत्र में पिरोना समय की मांग है। इस पवित्र उददेश्य के लिए हमें एक नये जीवन दर्शन का विकास करना होगा । राज्य शासन अब इसको और अनदेखा नही कर पायेगा।

डा.महेन्द्र श्रीवास्तव
 
 
MP Bundeli Books Edition
 

 
 
Editor's Column
 
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Thakur Vikram Singh (Editor)
 
 
 
 
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