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बुन्देली
क्षेत्र
एक
परिचय
किसी भी
राष्ट्रीय
प्रशासन
की
प्रमुख
इकाइयों
को
राज्य
कहा
जाता
है।
राज्य
का
गठन
दो
तरह
से
होता
है–एक
तो
सत्ताधारी
की
सुविधा
के
अनुसार
और
दूसरे
जन
आकांक्षाओं
के
अनुरूप।
भारत
में
अंग्रेजों
ने
अपने
साम्राज्य
के
हितों
के
अनुकूल
राज्यों
की
रचना
की
थी।
आजादी
के
बाद,
फिरंगियों
का
ऐसा
ही
ताना
बाना
हमारी
राष्ट्रीय
सरकार
को
मिला।
स्वाधीनता
के
प्रारम्भिक
वर्षों
में
यही
कायम
रखा
गया
किन्तु
जनमत
की
प्रबल
मांग
के
अनुसार
राज्यों
का
पुनर्गठन
करना
ही
पड़ा।
देश
में
स्वतंत्रता
मिलने
के
बाद
सबसे
बड़ी
घटना
थी –
भाषा
के
आधार
पर
राज्यों
की
रचना।
लेकिन
इसके
लाभ
से
विशाल
हिन्दी
क्षेत्र
को
वंचित
ही
रह
जाना
पड़ा।
अंग्रेजों
ने
अपनी
सुविधा
के
जो
जैसे
राज्य
बनाएं
थे
उन्हें
यहां
वैसे
ही
रहने
दिया
गया।
हां,
भाषावार
राज्यों
के
पुनर्गठन
की
प्रक्रिया
में
जो
हिन्दी
भाषा
भाषी
क्षेत्र
अतिरिक्त
करार
दे
दिये
गए,
उन्हें ‘कहीं
की
ईंट
कहीं
का
रोड़ा,
भानुमती
ने
कुनबा
जोड़ा’
की
भांति
एक
मध्यप्रदेश
राज्य
के
रूप
में
गूॅथ
दिया
गया।
इन
सबका
परिणाम
आखिर
जो
होना
था,
वही
हुआ।
योजनाबद्ध
रूप
से
पुनर्गटन
किये
गये
राज्यों
की
अपेक्षा
तथा
कथित
विशाल
हिन्दी
क्षेत्र
के
राज्य
कई
दृष्टियों
से
पिछड़े
हुए
हैं।
विकास
की
गति
में
पीछे
रह
जाने
का
कारण
इन
राज्यों
का
भारी
भरकम
स्वरूप
तो
है
ही,
इनके
आंचलिक
एकीकरण
का
अभाव
भी
है।
पुलिन्द
देश
जिस भूभाग
को
बुन्देली
क्षेत्र
कहते
हैं
उस
पर
चेदि,
मौर्य,
शंुग
वाकाटाक,
भारशिव,
नाग,
गुप्त,
हूण,
हर्षवर्धन,
कलचुरी,
चन्देल,
अफगान,
मुगल,
गौड़
और
बुन्देलों
का
शासन
रहा
है।
सम्राट
अशोक
के
राज्यकाल
में
इस
क्षेत्र
को
पुलिन्द
देश
के
नाम
से
सम्बोधित
किया
जाता
था।
कालिदास
की
कृति
रघुवंश
में
जिस
पुलिंद
जाति
का
उल्लेख
आया
है
वह
यहां
की
सत्ताधारी
थी।
वेद
पुराण,
अनेक
शिलालेखों
और
ताम्रपत्रों
में
पुलिन्द
नरेशों
और
पुलिन्द
देश
की
स्थिति
के
संकेत
मिलते
हैं।
कुछ
विद्वानों
का
मत
हैं
कि
सहीं ‘पुलिन्द’
शब्द
आगे
चलकर ‘बोलिन्द’
और
कालान्तर
में ‘बुन्देल’
हो
गया।
भाषा
विज्ञान
के
प्रयत्न
लाघव
नियमानुसार
ऐसा
शब्द
परिवर्तन
होना
स्वाभाविक
है।
ब्राह्यी
लिपि
के
एक
भेद
को
बोलिन्दी
कहते
हैं।
इस
क्षेत्र
के
अनेक
प्राचीन
शिलालेख
बोलिन्दी
में
लिपिबद्ध
हैं।
अनेक
नाम
चूंकि
बुन्देलखंड
विंध्याचल पर्वत
का
ही
प्रमुख
भाग
है
अत:
उसके
नामकरण
में ‘विंध्य’
से
विंध्येल
और
फिर
बुन्देल
की
व्युत्पत्ति
बताई
जाती
है।
इसे
कभी
विंध्याचल
देश
भी
कहा
जाता
था।
चेदिदेश,
जेजाक
भुक्ति
या
जुझौति,
दशार्ण,
कर्णावति,
कालिंजर
प्रदेश
डाहल,
पिपलादि,
वन्यदेश,
चित्रकूट
देश,
युद्धदेश,
मध्यप्रदेश
आदि
नामों
से
समूचा
बुन्देलखंड
अथवा
उससे
विशिष्ट
भाग
इतिहास
में
जाने
जाते
रहे
हैं।
‘बुन्देलखंड’
नाम
के
साथ
एक
और
धारणा
जुड़ी
हुई
है।
बुन्देले
इस
भूभाग
के
मूलनिवासी
नहीं
है।
वे
विंध्य
की
इस
उपत्यका
में
आकर
बस
जाने
के
बाद
ही
बुन्देले
कहलाए।
जन
श्रुति
के
अनुसार
गहरवार
क्षत्रिय
कुलोत्पन्न
महाराजा
हेमकरण
अपने
भाइयों
द्वारा
काशी
राज्य
छीन
लिए
जाने
पर
विंध्यवासिनी
देवी
की
मनौती
करने
के
लिए
आये
कि
उनका
राज्य
उन्हें
पुन:
मिल
जाय।
आराधना
के
दौरान
महाराज
हेमकरण
ने
तलवार
उठा
कर
अपने
सिर
की
बलि
देनी
चाही
कि
देवी
ने
उनका
हाथ
पकड़
लिया।
परन्तु
उनके
मस्तक
पर
तलवार
की
खरोंच
लग
गर्ठ,
और
रक्त
की
कुछ
बूॅद
देवी
जी
को
समर्पित
करने
के
कारण
महाराज
हेमकरण
की
संताने
बुन्देला
कहलाई।
हर
निवासी
बुंदेला
महाराजा छत्रसाल
के
राज
कवि
मोरेलाल ‘लाल’
ने ‘छत्र
प्रकाश’
में ‘बुन्देला’
नाम
की
उपयुर्क्त
कल्पना
की
है।
लगता
है
कि
कवि
लाल
ने
बूंद
से
बुन्देला
की
यह
कल्पना
उस
समय
की
थी
जबकि
क्षत्रियों
को
उकसाने
हेतु
यह
बतलाना
आवश्यक
था
कि
उनके
मूल
में
ही
आत्मोत्सर्ग
की
भावना
सन्निहित
हैं।
इसके
अतिरिक्त
यह
व्युत्पत्ति
भाषा
वैज्ञानिक
महत्व
नहीं
रखती।
अत:
बुन्देला
ठाकुरों
से
ही
संबंधित
कर
संकीर्ण
नहीं
किया
जाना
चाहिए।
जिस
तरह
महाराष्ट्र,
पंजाब
और
बंगाल
का
प्रत्येक
निवासी
मराठा,
पंजाबी
और
बंगाली
कहलाता
है
उसी
तरह
बुन्देलखंड
का
हर
निवासी
बुन्देला
है।
स्थिति
पर
प्रकाश
जनविश्वास के
अनुसार
भारत
वर्ष
के
मध्य
में
स्थित
क्षेत्र
विशेष
को
बुन्देलखण्ड
कहते
हैं।
लेकिन
सही
स्थिति
और
सीमाओं
के
संबंधो
में
बहुत
कम
लोगों
को
जानकारी
है।
ब्रिटिश
विश्वकोश (एनसाइक्लापीडिया
ब्रिटानिका)
में
बुन्देलखंड
का ‘जेजाक
भुक्ति’
के
रूप्
में
उल्लेख
किया
गया
है।
इतिहासकारों
ने
राजा
जेजाक
अथवा
जयशक्ति
को
महान
प्रतापशाली
शासक
कहकर
उनका
राज्य
यमुना
से
नर्मदा
तक
विस्तृत
बतलाया
है।
इसी
कारण
जेजाक
भुक्ति
नाम
इस
प्रदेश
का
पड़ा।
श्रीकृष्ण
बल्देव
वर्मा
का
तर्क
है
कि
वैदिक
कालीन
यजुवेर्दीय
कर्मकाण्ड
का
यहां
सर्वप्रथम
अभ्युदय
होने
के
कारण
यह
प्रदेश ‘याजुर्होति’
कहा
गया
था
और
यही
शब्द
बाद
में
जेजाक
भुक्ति
के
रूप्
में
प्रचलित
हो
गया।
महाभारत कालीन
चेदि
नरेश
शिशुपाल
वर्तमान
बुन्देलखंड
के
अधिकांश
भाग
के
शासक
थे।
चन्देरी
उनकी
राजधानी
थी।
इतिहासकार
डा.
महाजन
ने
शिशुपाल
द्वारा
शासित
भू–भाग
को
आज
के
बुन्देलखंड
के
समकक्ष
दर्शाया
है।
इतिहास
वेत्ता
बी.
ए.
स्मिथ
ने
लिखा
है
कि
जिस
क्षेत्र
में
चन्देल
शासकों
ने
राज्य
किया
वह
बुन्देलखंड
है।
यह
क्षैत्र
गंगा,
यमुना
के
दक्षिण
में
नर्मदा
तक
फैला
हुआ
है।
‘एनसाइक्लोपीडिया
ब्रिटानिका’
बुन्देलखंड को
भारत
के
मध्य
का
वह
भाग
कहा
गया
है
जिसकी
पूर्वी
सीमा
बघेलखंड
की
सीमा
से
मिलती
है।
जार्ज
ग्रियर्सन
ने
गजेटियर
आफ
इंडिया
के
आधार
पर
लिखा
है
कि
बुन्देलखंड
वह
भू–भाग
है
जो
उत्तर
में
यमुना,
उत्तर
पश्चिम
में
चम्बल,
दक्षिण
में
मध्यप्रांत
के
जबलपुर
और
सागर
संभाग
तथा
दक्षिण
और
पूर्व
में
रीवा
अथवा
बघेलखंड
के
मध्य
में
स्थित
हैं
और
जिसके
दक्षिण
तथा
पूर्व
में
मिर्जापुर
की
पहाडि़या
है।
उन्होंने
आगे
लिखा
है
कि
राजनैतिक
दृष्टि
से
इस
क्षेत्र
में
अंग्रेजी
राज
के
बांदा
हमीरपुर
जालौन
और
झांसी
जिले
ग्वालियर
एजेंसी
पूर्ण
बुन्देलखंड
एजेंसी
तथा
बघेलखंड
एजेंसी
का
कुछ
भाग
शामिल
हैं।
बुन्देलखंड में
महाराजा
छत्रसाल
की
शासन
सत्ता
इस
प्रकार
थी :–
इस जमना
उत
नर्मदा,
इस चम्बल
उत
टौंस
।
छत्रसाल सौं
लरन
की,
रही न
काहू
हौंस
।।
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