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बुन्देली
क्षेत्र
का
परिचय-2
सांस्कृतिक
स्वरूप
बुन्देलखंड भू-भाग
का
अतीतकालीन
राजनैतिक
स्वरूप
स्थिर
नहीं
रहा।
शासकों
की
शक्ति
के
संकुचन
या
विस्तार
के
अनुसार
यह
आकार
छोटा
बड़ा
होता
रहा।
लेकिन
इसका
सांस्कृतिक
रूप
सदियों
से
विशाल
बना
रहा।
संस्कृति
का
यह
सबसे
बड़ा
संबल
भाषा
हैं।
इस
आधार
पर
परखने
से
बुन्देलखंड
का
आकार-प्रकार
स्पष्ट
हो
जाता
है।
अनेक
भाषा
शास्त्रियों
ने 'बुन्देलखंड'
पर
शोध
कार्य
किये
हैं।
इनमें
से
डा.
एम.पी.
जायसवाल
ने
शुद्ध
बुन्देली
जिले
टीकमगढ़,
जालौन
जिले
का
अधिकांश
भाग,
हमीरपुर,
ग्वालियर
क्षेत्र
के
चन्देरी
एवं
मुंगावली
इलाके,
भोपाल
व
विदिशा
जिले
का
आधा
पश्चिमी
भाग
एवं
दतिया
की
सीमा
के
भाग
बताए
हैंं।
उनके
शेष
बुन्देली
भाषी
जिले
छतरपुर,
पन्ना,
दमोह,
नरसिंहपुर,
होशंगाबाद,
सिवनी,
बालाघाट,
छिन्दवाड़ा
तथा
दुर्ग
के
कुछ
भाग
है।
डा. रामेश्वर
प्रसाद
अग्रवाल
ने
बुन्देलखण्ड
के
अंतर्गत
आने
वाले
जिलों
जालोैन,
हमीरपुर,
झांसी,
बांदा,
टीकमगढ़,
छतरपुर,
पन्ना,
दमोह,
सागर,
नरसिंहपुर,
भिंड,
दतिया,
ग्वालियर,
शिवपुरी,
मुरैना,
गुना,
विदिशा,
रायसेन,
होशंगाबाद
का
नामोल्लेख
करने
के
पश्चात
लिखा
है
कि
भाषायी
व्यापकता
की
दृष्टि
से
उक्त
सीमा
में
कुछ
परिवर्तन
अवश्य
होंगे,
जैसे
कि
नर्मदा
के
दक्षिण
स्थित
छिंदवाड़ा,
सिवनी
तथा
बैतूल
जिले
मराठी
मिश्रित
होते
हुए
भी
बुन्देली
भाषी
ही
ठहरेंगे।
ऐतिहासिक
परम्पराएं,
सांस्कृतिक एकता,
सामाजिक
समानताएं,
भौगोलिक
सुगमता
और
विकास
की
अनुकूलता
किसी
भी
आदर्श
राज्य
के
गुण
माने
जाते
है।
बुन्देलखंड
राज्य
के
स्वरूप
में
ये
सभी
गुण
विघमान
है।
बुन्देलखण्ड
का
आकार
प्रकार
स्थापित
करने
में
अनेक
विद्वानों
के
जो
विभिन्न
मत
है,
उनमें
अन्तर
बहुत
कम
है।
इन
सभी
का
जो
एक
सामान्य
निष्कर्ष
निकलता
है
उसके
अनुसार
बुन्देलखंड
राज्य
के
अन्तर्गत 32
जिले
आते
हैं।
वे
इस
प्रकार
हैं-
जालोैन, हमीरपुर,
झांसी,
बांदा,
ललितपुर,
टीकमगढ़,
छतरपुर,
पन्ना,
दमोह,
सागर,
नरसिंहपुर,
भिंड,
दतिया,
ग्वालियर,
शिवपुरी,
मुरैना,
गुना,
विदिशा,
सीहोर,
भोपाल,
रायसेन,
होशंगाबाद,
हरदा,
बैतुल,
छिंदवाड़ा,
सिवनी,
मण्डला,
बालाघाट,
कटनी
और
जबलपुर।
इस सम्पूर्ण
क्षेत्र
की
भौगोलिक
स्थिति
दर्शाती
है
कि
इसे
धन
धान्य
से
परिपूर्ण
होना
चाहिए।
खनिज
सम्पदा
इतनी
है
कि
भौतिक
समृद्धि
का
सिरमौर
होना
चाहिए।
लोग
ऐसे
है
कि
पुरूषार्थ
में
प्रथम
पंक्ति
पा
लें।
लेकिन
यह
सब
नहीं
हो
सका
है।
यदि
इन 32
जिलों
के
लगभग
ढाई
करोड़
बुन्देलखंडियों
का
अपना
ही
राज्य
बना
तो
इतना
निश्चित
ही
कहा
जा
सकता
है
कि
यहां
की
प्रगति
के
जो
कार्य
विगत
पचास
वर्षों
में
नहीं
किए
जा
सके,
वे
पचास
महीनों
में
ही
पूरे
किए
जा
सकते
है।
विद्रोह
में
सबसे
पहले
आज हम
भले
ही
राजनैतिक
चेतना
की
कमी
को
बुन्देलखंड
के
पिछड़ेपन
का
एक
कारण
मान
लें,
लेकिन
यह
नहीं
भूलना
चाहिए
कि
डेढ़
सौ
वर्ष
पूर्व
उग्र
राजनैतिक
चेतना
के
कारण
ही
इस
भू-भाग
के
वासियों
को
विदेशी
सत्ता
के
भीषण
प्रतिशोध
का
सामना
करना
पड़ा।
अंग्रजी
शासन
के
विरूद्ध
सबसे
पहले
विद्रोह
करने
वाले
देशी
सत्ताधारी
श्री
अप्पाजी
भोंसले
द्वारा
प्र्रशासित
बुन्देलखंड
के
हिस्सों
को
उनसे
छीन
लिया
गया।
सन् 1820
से
मंडला,
बैतुल,
छिंदवाड़ा,
सिवनी
और
नर्मदा
के
दक्षिण
का
भाग 'सागर
नर्मदाप्रदेश'
के
नाम
तत्कालीन
गवर्नर
जनरल
के
एजेंट
द्वारा
शासित
होने
लगा।
अंग्रेजों
का
बुन्देलखण्ड
पर
यह
पहला
प्रशासनिक
हमला
था।
सन् 1931
में
उत्तर
पश्चिम
का
गठन
किया
गया
और 'सागर
नर्मदा
प्रदेश'
उसका
एक
अंग
बना
दिया
गया।
अंग्रेजी
जुल्म
ज्यादतियां
बढ़ती
गई।
उनका
प्रतिकार
भी
छुट-पुट
चलता
रहा।
लेकिन
संगठित
विद्रोह
का
श्रीगणेश
बुन्देलखंड
से
ही
हुआ।
इस
समय
सागर
जिले
के
चांदपुर
के
जवाहरसिंह
और
ललितपुर
जिले
के
नाराट
के
मधुकरशाह
और
नरसिंहपुर
के
डिल्लनसिंह
के
नेतृत्व
में
बगावत
का
बिगुल
बजा।
इस
प्रथम
विद्रोह
से
सागर
से
निमाड़
तक
का
भाग
काफी
प्रभावित
हुआ।
बुन्देलों
ने
खूब
लोहा
लिया
लेकिन
साधनों
की
कमी
के
कारण
उन्हें
शीघ्र
ही
बलिवेदी
पर
चढ़
जाना
पड़ा।
जालिम
अंग्रेजों
ने
उक्त
विद्रोहियों
के
गृह
स्थानों
को
बरबाद
कर
डाला।
उनके
खानदान
भी
मौत
के
घाट
उतार
दिए
गए।
मधुकर
शाह
को
सागर
लाकर
सार्वजनिक
रूप
से
फांसी
पर
लटकाया
गया।
स्वाधीनता
संग्राम
में
अग्रणी
भारत का
प्रथम
स्वाधीनता
संग्राम
सन् 1857
के
मई
मास
के
तृतीय
सप्ताह
में
मेरठ
के
सैनिक
विद्रोह
के
साथ
आरंभ
होना
बताया
जाता
है।
लेकिन
अंग्रेजों
के
दस्तावेज
और
उस
समय
की
गुप्त
सूचनाओं
के
रिकार्ड
यह
प्रमाणित
करते
हैं
कि
बुन्देलखं
डमें
क्रांति
की
तैयारी
जनवरी
माह
से
ही
प्रारंभ
हो
गई
थी।
जनवरी 1857
के
प्रथम
सप्ताह
में
नरसिंहपुर
क्षेत्र
में
रोटी
और
कमल
बांटे
जाने
की
सूचना
अंग्रेजी
अफसरों
को
मिल
चुकी
थी।
ऐसे
अन्य
अनेक
तथ्य
है।
समूची
गदर
में
बुन्देलखंड
के
बागियों
ने
जो
आग
धधकाई
थी
वह
एक
लम्बे
क्षेत्र
में
फैलती
रही।
अंग्रेजों
और
उनके
टुकड़खोरो
का
जमकर
नाश
हुआ।
लेकिन
क्रांति
की
विफलता
के
बाद
बुन्देलखंड
का
महानाश
कर
दिया
गया।
पीढिया
गुजर
गई
उसकी
प्रताड़ना
सहते
हुए।
अब
आज
की
नई
पीढ़ी
में
चेतना
आई
है
कि
अब
नहीं
रहेंगे
बुन्देलखंड
के
दुर्दिन।
ठा. विक्रम
सिंह
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