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बुन्देली
त्यौहार
तीज त्यौहार :– बुंदेलखण्ड मे त्यौहारों की तो धूम है,
वैसे तो यहा प्रतिदिन कोई न कोई त्यौहार होता रहता है,
राष्टीय पर्वों के साथ–साथ क्षेत्रीय पर्व भी मनाये जाते
है। यहा अधिकतर मिट्टी के घड़ों, वर्तनों का प्रयोग किया
जाता है। कुओ से पानी भरना, मिट्टी के घड़ों से पानी सिर
पर रखकर घर लाना और पानी को ची धिनौंची, चाहे वह ईट,
पत्थर, मिट्टी की बनी अथवा लकड़ी के खंमों पर एक बड़ा
पटिया रखकर बनायी गई है, रखा जाता रहा है। घरेलू खर्च का
पानी एक नांद नदौला में रखने का रिवाज था। यहा के प्रमुख
संस्कारों में पुष्वन आगन्नों, नामकरण, मुंडन, उपनयन जनेम,
विवाह संस्कार में सगाई, ओली, सुतकरा, पक्यात, लगुन, टीका,
वनी, चाढ़ाओं, आवरें, राछ बधाओं, पंचडेरा फिर विदा और
अंतिम संस्कार मृतक संस्कार होता रहा है। बुंदेलखण्ड में
पुरूष के जूते, पनइया, पिसौरी, झब्बेदार चमड़े की होती थी।
महिलाओं की जूती पौलीया कहलाती थी। यहा पर एक विशेष बात यह
है, कि सभी लोगों के घरों में महिलाओं की पुरानी धोतीओं से
भांति–भांति की कथरी बनवाकर उन्हें ओढ़ने–बिछोने के काम
में लाया जाता रहा है। महिलाओं में विशेषकर पिछड़े, दलित
और आदिवासी लोगो में गुदना गोदवाने की प्रथा है। छुआछूत भी
यहा के लोगों में कूट–कूट कर है। चिकित्सा क्षेत्र में
अधिकतम नहीं है। मतलब दवा में ज्यादा विश्वास नहीं है,
क्योंकि लोग अंधविश्वास से भृमित है। उनका विश्वास
झाड़फूंक एवं देवी देवताओं के पास जाकर धूप लेने में अधिक
विश्वास करते है।
गनगौर
यह पर्व चैत्र शक्ल तीज को होता है। यह व्रत सुहागिन
स्रियाँ ही करती हैं। इस त्यौहार में स्रियाँ पार्वती जी
की पूजा करती हैं व --प्रसाद-- नैवेद्य में गनगौर बनाये
जाते हैं। यह प्रसाद पुरुषों को नहं दिया जाता है। सौभाग्य
की कामना करने वाली हर स्री इस व्रत को बुन्देलखण्ड की
धरती पर अनन्त काल से करती आ रही है।
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