MP के पूर्व मंत्री की अंतिम यात्रा में पहुंचे शिवराज-दिग्विजय, बेटियों ने दी मुखाग्नि

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मप्र के पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं मुंगावली विधायक महेंद्रसिंह कालूखेड़ा बुधवार को पंचतत्व में विलीन हो गए। कालूखेड़ा को उनके गृहगांव कालूखेड़ा में राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। बेटी गरिमा और कनक सिंह ने पिता को मुखाग्नि दी। अंतिम यात्रा सीएम शिराजसिंह चौहान, पूर्व सीएम दिग्विजयसिंह, मप्र विस उपाध्यक्ष डॉ राजेंद्र कुमार सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, नेता प्रतिपक्ष अजयसिंह सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।

– बुधवार सुबह साढ़े 10 बजे उनके निवास से हजारों लोगों के बीच जब उनकी अंतिम यात्रा निकली तो हर आंख नम हो गई। अर्थी को कंधा देते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया की आंखें भी भीग गईं। यात्रा गांव से होते हुए एक किलोमीटर दूर सेमलिया रोड स्थित उनके फॉर्म परिसर पहुंची, जहां उन्हें गार्ड ऑफ आॅनर दिया गया। इसके बाद बेटी गरिमा सिंह ने सभी रस्में पूरी की और छोटी बहन कनक के साथ पिता को मुखाग्नि दी। उनकी अंत्येष्टि में ऐसा हुजूम था कि लोगों ने पेड़ पर चढ़कर अपने चहेते नेता को विदा किया।
एक नजर…

नाम : महेंद्रसिंह कालूखेड़ा
पिता : मोहनसिंह चंद्रावत।
जन्म वर्ष : 5 मार्च 1945
जन्म स्थान : गांव लीमड़ी, पंचमहल गुजरात।
गृह गांव : ग्राम कालूखेड़ा, जावरा।
मूल पहचान : श्वेत क्रांति के मसीहा व किसान नेता।
शिक्षा : एम.ए., एल.एल.बी.।
ऐसा रहा सफर-

– संविद सरकार के समय राजमाता विजयाराजे सिंधिया मंदसौर दौरे पर आईं थीं।, तभी सिंधिया स्टेट के ठिकाने कालूखेड़ा में भी उनके कदम पड़े। यहीं एमए, एलएलबी कर चुके युवा महेंद्रसिंह चंद्रावत ‘कालूखेड़ा’ की काबिलियत राजमाता ने पहचान ली और वे कालूखेड़ा को ग्वालियर ले गईं। वहां वे माधवराव सिंधिया के संपर्क में आए। पायलेट की ट्रेनिंग कर एयरफोर्स में चयनित हो चुके कालूखेड़ा को माधवराव ने कहा- महेंद्र आप राजनीति में आओ। आप जैसे युवा नहीं आएंगे तो कौन आएगा? उसके बाद 1972 में महेंद्रसिंह ने अशोकनगर सीट पर जनसंघ के टिकट पर विधायक का पहला चुनाव जीता। 26 साल की उम्र में ही विधायक बने और यहीं से एयरफोर्स की उड़ान छोड़ चुके महेंद्रसिंह ने राजनीति में भी ऊंची उड़ान भरी।

– 1984 में जब माधवराव सिंधिया अटलबिहारी वाजपेयी को हराकर राष्ट्रीय पटल पर चर्चा में आए तो सिंधिया की गुना सांसद सीट खाली हो गई। सिंधिया ने यह सीट कालूखेड़ा को दे दी। महेंद्रसिंह पहली बार सांसद बने। इसके बाद राजमाता तो जनसंघ व भाजपा में रहीं, लेकिन माधवराव के साथ कालूखेड़ा भी कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस ने कालूखेड़ा को राजमाता के सामने ही मैदान में उतार दिया। उन्होंने अपना उपनाम चंद्रावत के बजाय ‘कालूखेड़ा’ रख लिया।

राजनीतिक उपलब्धियां
– 45 वर्षीय राजनीतिक कॅरियर में चार बार कैबिनेट मंत्री, छह बार विधायक व एक बार सांसद रहे। नेशनल को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन ऑफ इंडिया, नेशनल कौंसिल ऑफ स्टेट एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड, मप्र हाउसिंग बोर्ड, मप्र मिल्क को-ऑपरेटिव फेडरेशन, मप्र सीड्स एवं फॉर्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन में चेयरमैन रहे। वर्तमान में मप्र रायफल एसोसिएशन के चेयरमैन थे।

– जब शिक्षा मंत्री थे तब संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रभावी उद्बोधन दिया था। वर्ष 1993 में सबसे पहले शिक्षा मंत्री रहते हुए विस में जावरा को जिला बनाने का प्रस्ताव रख चुके। सक्रियता के कारण मप्र विस में श्रेष्ठ मंत्री व विधायक के खिताब से नवाजे जा चुके।

पारिवारिक स्थिति
– चार भाइयों में महेंद्रसिंह सबसे बड़े थे। इनसे छोटे महिपालसिंह चंद्रावत हैं जो इंदौर में निवासरत हैं। तीसरे भाई नरेंद्रसिंह चंद्रावत पुलिस (महू थाना प्रभारी) में थे जो वर्ष 1996 में शहीद हो गए। सबसे छोटे के.के. सिंह कालूखेड़ा मंडी बोर्ड भोपाल से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त हुए और वर्तमान में आईजीसीआर प्रदेश अध्यक्ष हैं। इनके दो बेटियां हैं। बड़ी बेटी गरिमा सिंह की शादी हो गई और वे अमेरिका में रहती हैं। दूसरी बेटी कनककुंवर अमेरिका में ही जॉब में हैं।

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