|
बुन्देली
लोकोक्तियां
सुन्दर नीति
से
कही
गयी
उक्ति
को
सूक्ति
कहते
है।ऐसी
ही
उक्तिंयां
लोक
व्यवहार
और
जन
सामान्य
के
प्रयोग
मे
आकर
लोकोक्तियों
बन
जाती
है।
समास
शैली
मं
सरलतम
और
गम्मीर
अनुभूतियों
से
भरे
लोकोक्तियों
के
यह
केप्सूल
प्राय:
किसी
तथ्य
के
खण्डन
या
पुष्टि
अथवा
विरोध
या
समर्थन
के
लिए
रामवाण
बन
जाते
है।
लोकमानस
में
तैरती
और
लोक
कण्ठों
पर
थिरकती
यह
उक्तियां लोक
व्यवहार
के
प्रत्येक
क्षेत्र
से
जुड़ी
होती
है।
लोकोक्तियों का
अभिधेयार्थ
से
भिन्न
विशिष्ट
लाक्षणिक
अर्थ
ही
ग्रहण
किया
जाता
है।
अन्यास,
अनाम
और
अज्ञात
चिन्तकांे
के
अन्र्तमन
से
निकली
यह
सबल
सतेज,
रोचक
और
चुस्त
भाव
लहरियां
स्थानीय
भाषा
की
प्राणवत्त
पाकर
जीवन्त
हो
उठती
हंै।
बुन्देली
लोकोक्तियां अपने
पैने,
प्रभावशाली
और
सशक्त
संकेतों
के
माध्यम
से
इस
अंचल
के
जनसमान्य
और
प्रबुद्ध
लोगों
का
युगों –युगों
से
मार्ग
निदेर्श
करती
आ
रही
हंै।
यह
उक्तियां
सोए
को
जगाती
है,
आलसियों
को
झवझोरती
है,
मूर्खों
को
समझाती
ह,ै
बच्चों
को
दुलारती
ह,ैधूतोंको
डांटती
है,ं
बेईमानों
पर
उंगली
उठाती
ह,ै
पथभ्रष्टों
को
हटकती
हंै
और
प्रत्येक
पाखण्ड
का
पर्दा
उठाती
हैं
सब
कुछ
करती
है
लेकिन
किसी
पर
कीचड़
नही
उछालती
।
यहां
प्रस्तुत
है
कुछ
लोकोक्तियों
की
सारभूत
बानगी।
सत्य नितांत
मीठा
होता
है
लेकिन
लगता
कडुवा
है,
तभी
तो ‘संासी
कैेयं
संग
छूट
जात ’और
सांसी
कैयं
मौसी
को
काजर
हो
जात’’
।
अस्थिर
चित्र
होने
से
ही
कभी
कभी ‘दाउ
दोन
से
से
गये
पॉड़े ,हलुआ
मिले
न
मांडे’
स्थिति
बनती
है।
परिस्थिति
वैमस्य
में
मर्यादा
निर्वाह ‘सकरे
में
समदियाना ’बन
जाता
है
और
जब
कोई
तुरंत
बदला
चुका
देता
तो‘ ‘दोज
कौ
बायनों
तीज
खां’े
कहा
जाता
है।
शादी –विवाह
के
अवसर
पर ‘चढ़ाय
की
नान’
का
महत्व
सब
मानते
हंै
लेकिन
किसी
निर्बल
पर
सदैव
दोषारोपण
होने
पर
लोग
कहते
हैं‘ ‘अरे
धरे
खांे
गुपला
नाउ’
हमारे
यहां‘
खीर
मे
सोंज
महेरी
में
न्यारे’
में
रहने
वालों
को
प्राय:
तुरन्त
परख
लिया
जाता
है।
छोटा परिवार
सुखी
परिवार
होता
है
लेकिन
जहां
इस
नियम
का
पालन
नही
होता
है
उस
घर
की
लक्ष्मी
दीवाल
तोड़कर
निकल
जाती
है।
यह
उक्ति
देखिए
सास बउ
की
एकई
सोर।
लच्छो कड़
गई
पाखौ
फोर।।
हमारे यहां‘
मांेगे
मोगे
के
दो
हंेसा’
मिलते
हंै
लेकिन ‘घर
को
परसइया
और
अंदयारी
रात ’का
मजा
कुछ
और
ही
होता
है।
कभी
यह
भी
सोचना
पड़ता
है
कि‘
न
सूरा
नेवतोदे
ने
दौे
जाने
बुलाव’।‘
बीेदे
पै
सीदौ’देना
और‘ंगदा
के
कक्का ’कहना
तो
विवशता
है
किन्तु
जब ‘नरदा
की
बिन्तबारी
खों
गये
और
बखरी
हार
गय’े
तब
दुख
होता
है।
वस्तुत:‘
हांत
में
से
पिल्ला
छौडो
कूर
कूर
करत ’समझदारी
नही
है
लेकिन‘
ओइ
पातर
में
खाव
ओई
में
छेद
करौ’
पहले
दर्जे
की
धूर्तता
है।
यद्यपि‘ दई
में
मूसर ’देने
वालों
की
कमी
नहीं
है
लेकिन ‘मड़वा
भीतर
कूबर
हो
जाय’
तो
अच्छी
बात
है
सही
बात
तो
यह
है –
जी के
गांव
में
रइए
तेइ
तैसी
कइए।
उंट बिलइया
ले
गइ
सो
हांजू
हाजू
कइए।।
असमर्थता की
यह
व्यंजना
कितनी
पैनी
है‘
कड़ी
तो
मुरत
नइयां
बरियन
पै
हात
पसारत ’हमारे
यहां‘
गुरू
खांय
गुलगुलन
को
पारेज ’करनेवोले
और ‘हर्र
लगे
न
फटकरी ,रंग
चोखों
आ
जाय ’के
साधक
सर्वत्र
मिलते
है।
जब
कभी
ब़डे
आदमी
के
कार्य
के
साथ
किसी
छोट
व्यक्ति
का
कार्य
सम्पन्न
हो
जाय
ता ‘े
माते
की
भांवरन
में
भांवरे’
पड़
जाती
हैं।
अपने
व्यय
से
पराई
प्रतिष्ठा
बढ़ाना
बुद्धिमत्ता
नही
है।
तभी
तो
कहा
जाता
है
कि ‘अपना
भात
पराय
म़डवा
तरे
कायखां
परसत’।
विपत्ति को
सादर
आमंत्रित
करना ‘गा
बजाके
भुमानी
बुलाना ’कहा
जाता
है
तथा
चुपचाप
किसी
हानि
पहुंचाने
वाले
स‘
भांके
न
दरार्य
मसकउं
काट
खांय ’कहा
जाता
है। ‘टीका
की
बेरां
बोार
कातने’
वाले
प्राय:
मिल
ही
जाते
हैं।
कुछ
लोग
ऐसे
भी
मिलते
हंै
जिन्हें‘
उंगत
से
और
बिछी
मिल’
जाती
है।
अपेक्षा
के
बावजूद
अपना
महत्व
प्रदर्शित
करने
वाले
से
यह
कहना
कितना
सटीक
है,‘
को
उ
पूछे
न
बताय
दूला
की
मौसी
आंय’।
‘दुदार
की
दो
लातं’े
सही
जाती
हैं
और‘
अपने
बीेदे
सौत
के
मायके
जान’े
में
भी
कोई
हर्ज
नही
होता
लेकिन ‘पांवनन
सांप
नई
मरवाव
जात’।
जब किसी
से
सहयोग
और
सहायता
की
अपेक्षा
हो
और
वह
हानि
करने
पर
उतारू
हो
जाय
तो
स्थिति
कुछ
इस
तरह
बनती
है
कि‘
मांछी
भगावे
बैठारे
और
संगे
खान
लग’
यह
तथ्य
तो
सभी
जानते
हं
कि ‘ओखद
कउं
से
आय,
लुडिया
सिलौटा
तो
गांव
कोई
लगत ’जहां,‘
सूज
सी
बारीकी
और
मूसर
सोे
भरा’हो
वहंा
तो
ग़डबड़
ही
है
लेकिन ‘सब
रात
पीसौऔर
पारे
से
उठाव ’कुछ
अखरता
है।‘
जईसिया
को
मायको
मई
रावन
की
गैल’
सुनकर
तो
आसन्न
संकट
दिखाई
देता
ही
है
लेकिन ‘जई
भूतन
की
डर
उतइर
लरका
लुचई
मांग’े
तब
धर्म
संकट
की
स्थिति
बनती
है।
प्रकृति भेद
से
गुण
धर्म
पृथक
होते
हैं
अन्यथा‘
ओई
बांस
के
डला
टोकना
ओइ
के
चलनी
सूप ’क्यों
कहा
जाता
।‘
मामा
के
आंगे
ममयवारे
की
बाते’
अटपटी
लगती
है
फिर ‘अपने
मौं
धनाबाई’
कहना
किसके
शोभा
देता
है।..
हां..
अपनी
शक्ति
और
शोर्य
के
बल
पर
धनाबाई
बनना
किसी
बिरले
का
ही
काम
हो
सकता
है।
श्रीमती ज्ञान
तिवारी
|