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बुन्देली
की
व्याकरणगत
विशेषताएं
बुन्देली
भाषा
का
बुनियादी
शब्द
भंडार
और
व्याकरण
अपने
जन
समाज
की
भाषा
संबंधी
हर
आवश्यकता
पूरी
करने
योग्य
है।
यह
भाषा
समाज
के
हर
प्रकार
के
विकास
के
लिए
महान
अस्त्र
है
और
उसके
ऐतिहासिक
विकास
की
महान
सफलता
भी
है।
बुन्देली
और
हिन्दी
में
भाषागत
भिन्नता
बुन्देली
ध्वनि
में 10
स्वर 27
व्यंजन
हैं।
देवनागरी
के
शेष 16
अक्षर
इसमें
नही
हैं।
इन
दस
स्वरों
में
से
उच्चारण
हिन्दी
साहित्य
से
भिन्न
हैं।बुनियादी
750 शब्दों
में
से
मुश्किल
से 50
शब्द
दोनों
भाषाआं
में
समान
होगं।
इतने
ही
और
शब्दों
को
खींच
तान
कर
समानता
ढूंढी
जा
सकती
है।
बाकी
बुनियादी
तौर
पर
प्रथक
हैं
क्रयाओं
के
विभिन्न
काल
बनाने
के
प्रत्ययों
में
सब
एक
दूसरे
से
भिन्न
है, और
कोई
समानता
नही
है।
धातुओं
में
विकार
भी
भिन्न
प्रकार
से
होता
है।
क्रि्याओं में
जुड़ने
वाले
सब
प्रत्ययों
का
हिन्दी
में
अभाव
है।
हिन्दी
प्रत्यय
संस्कृत
से
लेती
है।
जो
बुंदेली
से
बिल्कुल
नही
मिलते
हैं।
बुन्देली
संज्ञा
शब्दां
की
भी
हिन्दी
से
भिन्नता
है
।यह
भिन्नता
भाव
वाचक
और
व्यक्ति
वाचक
नामों
में
तो
बहुत
है
ही
जाति
वाचक
नाम
भी
काफी
भिन्न
प्रकार
के
हैं।
कारक
के
चिन्हों
में
से
केवल 4
चिन्ह
समान
हैं
शेष 10
भिन्न
हैं।
कारण
सम्बन्धी
विकार
भी
हिन्दी
से
भिन्न
होता
है।
बुन्देली
सर्वनाम 33
हैं
।10
मूल
और 23
रूपंातर
के।
इनमें
केवल 7
एक
मूल
और 6
रूपांतरों
के
हिन्दी
से
समानता
रखते
हैं ,शेष
26 भिन्न
हैं।
विशेषण,
क्रियाविशेषण,
सम्बन्ध
बोधक,
समुच्चय
बोधक
और
विस्मयाधि
बोधक
शब्द
अधिकतर
हिन्दी
से
भिन्न
है।
भाषा
में
प्रयत्न
लाधव
के
नियम
बुंदेली
भाषा
हिन्दी
से
बहुत
आगे
निकल
गई
है।
उसके
संज्ञा,
सर्वनाम,
क्रियाओं
आदि
सब
शब्द
अति
संक्षिप्त
होते
हैं।
स्वरों
का
भारी
उपयोग
होता
है।
अधिकांश
मूल
शब्द
एक
दो
अक्षरों
के
ही
रह
गए
हैं।
तीन
अक्षरों
से
अधिक
वाले
शब्द
केवल
सात
हैं।
चार
से
ज्यादा
तो
बिरले
ही
होते
है।
इसके
मुकाबले
हिन्दी
के
शब्द
अधिकतर
भारी
भरकम
होते
हैं।
संस्कृत
उपसंर्गो
का
बुंदेली
में
कोई
स्थान
नही
है।
बुन्देली
की
व्याकरणगत
विशेषताएं :–
बुंदेली
की
ज्ञात 750
मूल
क्रियायें,
जिसकी
धातुएं 2550े
से
अधिक
हैं।
एक –
एक
क्रि्रया
से
बंुदेली
भाषा
के
लिंग –पुरूष
वाच्य
और
काल
भेद
से 288
रूप
या
शब्द
बनते
हैं।
और
ये
रूप 2550
धातुओं
के
सात
लाख
से
अधिक
होते
हैं।
वकाल
वाचक
रूपोंं
या
शब्दों
के
अलावा
इन्हीं
धातु
मात्र
से
दो
हजार
से
अधिक
भाव
वाचक
संज्ञाएं
बनती
हंै।
सामान्य
भूत
और
सामान्य
वर्तमान
काल
वाचक
शब्दों
के 1530
विशेषण
होते
हैं।
वधातु
में
न
प्रत्यय
जोड़ने
से
तत्संबंधी
विशेष
ढंग
बताने
वाले 600
से
अधिक
शब्द
बनते
हैं।
इसी
प्रकार
एक
दो
अक्षर
वाले
प्रत्यय
जोड़ने
से
इनके
विभिन्न
कर्ता
वाचक,
कर्म
वाचक,
करण
वाचक,
विश्ेाष
क्रिया
विशेषण,
विशेष
आदत
वाले,
विशेष
स्वभाव
वाले ,विशेष
काम
वाले ,पूर्व
कालिक
क्रिया,
सामान्य
सिलसिला,
सिलसिले
का
प्रारम्भ,
निश्चितता,
अभ्यास
तथा
विशेष
अवसर
वाची
शब्द
नियमित
रूप
से
बनते
हैं।
ये
सब
शब्द
शक्ति
प्रकरण
के
अनुसार 15000
से
अधिक
होते
हैं।
इसी
प्रकार
यह
भाषा
संज्ञा,
सर्वनाम,
विशेषण,क्रिया
विशेषण,
सम्बंध
वाचक,
समुच्यवाचक
विस्मयादि
बोधक
आदि
बुंदेली
शब्दों
से
भरपूर
हैं।
प्रत्येक
संज्ञा
शब्द
से
उस
सम्बन्धी
विशेषण
और
क्रिया
शब्द
अलग
होते
है।
इसी
प्रकार
विशेषण
शब्द
की
भाव
वाचक
संज्ञायें
और
क्रिया
शब्द
होते
है
जिनकी
संख्या
लाखों
में
पंहुचती
है।
बुंदेली
भाषा
जीवंत
वैज्ञानिक
भाषा
है
जबकि
हिन्दी
किसी
भी
क्षेत्र
की
मातृभाषा
नही
हैं।
यह
खड़ी
बोली
संस्कृत,
अंग्रेजी
की
खिचड़ी
भाषा
हैं
।सच्ची
ठोस
एकता
जनभाषाओं
के
द्वारा
स्वाभाविक
रूप
से
विकसित
होती
है।
बुंदेली
का
बुनियादी
शब्द
भंडार
और
व्याकरण
का
सांगोंपांग
ढांचा
शीघ्र
प्रकाश
मं लाने
से
बंदेली
गद्य
का
विकास
हो
सकेगा।
इससे
एक
जीवन्त
क्रियाशीलता
का
विकास
होगा।
इससे
बुंदेली
साहित्य
की
कमी
पूरी
हो
सकेगी।
लक्ष्मीचन्द्र नुना
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